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Chapter 3 · Number Play

Collatz परिकल्पना: ऐसा सवाल जो कोई बच्चा पूछ सकता है और कोई तय नहीं कर सकता

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एक नियम, सिर्फ़ 2 रास्तों वाला: संख्या सम हो तो आधा कर दो, विषम हो तो 3 गुना करके 1 जोड़ दो। जो मिला, उसी पर फिर वही नियम। 12 से शुरू करो और 10 संख्याओं में 1 आ जाता है। 17 से शुरू करो, 13 संख्याएँ। 21 से, 8। 22 से, 16।

मुख्य idea

यह chapter ऐसी प्रक्रियाओं से भरा है जो हमेशा कहीं न कहीं पहुँचती हैं — सबसे बड़ा number हमेशा अपना खाना जीतता है, 6174 हमेशा लौट आता है, दो अंकों वाली शुरुआत से reverse-and-add हमेशा ख़त्म होता है। Collatz बिलकुल इन्हीं जैसा दिखता है, इनमें से किसी से भी चलाने में आसान है, और कक्षा 6 की एक class एक दोपहर में इसे पचास numbers पर जाँच सकती है। और यह सच है, ऐसा पता नहीं है। यही फ़ासला पूरी बात है: उदाहरण जाँचते रहना, चाहे कितने भी, पूर्ण संख्याओं को कभी ख़त्म नहीं करता, और यह किताब की पहली जगह है जहाँ काम करते देखा है और पता है कि काम करता है का फ़र्क़ दार्शनिक नहीं, असली फ़र्क़ बन जाता है।

आपको क्या आना चाहिए

  • छपे हुए कुछ अनुक्रमों के पीछे का नियम, लगातार पदों की तुलना करके निकालना
  • किसी भी शुरुआती पूर्ण संख्या से अनुक्रम बनाने के लिए नियम लगाना
  • समझाना कि विषम वाले क़दम के बाद हमेशा सम वाला क़दम क्यों आता है
  • दिखाना कि अनुक्रम गिरने से पहले चढ़ सकता है, और page से एक उदाहरण देना
  • समझाना कि 2 की किसी घात तक पहुँचना अनुक्रम का बाक़ी हिस्सा क्यों तय कर देता है
  • समझाना कि जो दो अनुक्रम एक बार मिल जाएँ, वे फिर कभी अलग क्यों नहीं हो सकते
  • Collatz ने जो परिकल्पना की, और जिस साल की, उसे बताना
  • समझाना कि किसी समस्या के अनसुलझे होने का क्या मतलब है, और और ज़्यादा उदाहरण चलाने से वह क्यों तय नहीं होती
  • उस एक परिवार के लिए परिकल्पना साबित करना जहाँ वह साबित की जा सकती है: 2 की घातें
  • दी गई शुरुआत से, जैसे 100, अनुक्रम बनाना और जाँचना

जानने लायक़ शब्द

शब्दएक line में मतलबहिंदी / क्षेत्रीय समकक्षपहली बार कहाँ आया
conjectureऐसा दावा जिसे सच माना जाता है पर स्थापित नहीं किया गयापरिकल्पना§3.10, p.69 — वहीं छपा, संज्ञा और क्रिया दोनों रूप में
Collatz conjectureयह दावा कि यह नियम हर पूर्ण संख्या को नीचे 1 तक ले आता हैकोलैट्ज़ परिकल्पना§3.10, pp.68–69 — वहीं छपा, और section के शीर्षक में
Lothar Collatzवह German गणितज्ञ जिन्होंने 1937 में यह दावा कियालोथर कोलैट्ज़§3.10, p.69 — वहीं छपा
unsolved problemऐसा सवाल जिसे गणितज्ञ किसी भी तरफ़ तय नहीं कर पाएअनसुलझी समस्या§3.10, p.69 — वहीं छपा
whole numberवह क़िस्म की संख्या जिसके बारे में परिकल्पना हैपूर्ण संख्या§3.10, p.69 — वहीं छपा
even numberऐसी संख्या जो ठीक-ठीक आधी हो जाती हैसम संख्या§3.10, p.69 — वहीं छपा, नियम में
odd numberऐसी संख्या जो नहीं होतीविषम संख्या§3.10, p.69 — वहीं छपा, नियम में
sequenceकिसी एक शुरुआत से नियम जो numbers की कड़ी बनाता हैअनुक्रम§3.10, p.68 — वहीं छपा
Powers of 2Chapter 1 वाला दुगना होता अनुक्रम, वह अकेला परिवार जहाँ परिकल्पना साबित की जा सकती हैदो की घातेंchapter के अंत वाला Figure it Out, p.73 — वहीं छपा, पीछे Chapter 1, Table 1 का हवाला देते हुए
proofऐसा तर्क जो सिर्फ़ बहुत से नहीं, हर उदाहरण को एक साथ तय कर देउपपत्तिइस chapter में नहीं छपा; जो कमी है उसे नाम देने के लिए व्याख्या इसे लाती है

हिंदी column में standard NCERT हिंदी गणितीय शब्दावली दी गई है; यह Ganita Prakash के हिंदी संस्करण से उतारी नहीं गई है। Notes देखें।

लोग कहाँ चूकते हैं

  • "अनसुलझा का मतलब है किसी ने कोशिश नहीं की।" इसका मतलब है बहुत लोगों ने कोशिश की और नाकाम रहे। किताब यह सीधे कहती है।
  • "अनसुलझा का मतलब है हमें नहीं पता कि यह सच है, इसलिए शायद यह झूठ है।" इसे शुरुआती numbers की बहुत बड़ी-बड़ी ranges पर जाँचा जा चुका है, एक भी नाकामी के बिना। जो कमी है वह तर्क की है, सबूत की नहीं।
  • "अगर यह पहले हज़ार numbers पर काम करता है, तो काम करता है।" कोई आख़िरी पूर्ण संख्या नहीं है, इसलिए कितनी भी जाँच काम पूरा नहीं करती। पूरा topic इसी वाक्य को पहुँचाने के लिए है।
  • "अनुक्रम सिर्फ़ नीचे जाता है।" अनुक्रम (c) एक ही क़दम में तीन गुने से भी ज़्यादा हो जाता है। हर विषम संख्या ऊपर फेंकी जाती है। परिकल्पना ठीक इसीलिए कठिन है।
  • "लगातार दो विषम numbers आ जाएँ तो मुश्किल होगी।" वे कभी आते ही नहीं। विषम संख्या को तिगुना करने पर विषम मिलती है, और एक जोड़ने से वह सम हो जाती है, इसलिए विषम पद के बाद हमेशा सम पद आता है।
  • "अलग शुरुआती numbers बिलकुल अलग अनुक्रम देते हैं।" वे आपस में जुड़ जाते हैं। जब दो अनुक्रमों का एक पद साझा हो जाए, तो उस point से वे एक ही हैं, क्योंकि अगला पद सिर्फ़ मौजूदा पद पर टिका होता है। किताब के (b) और (d) page पर ही यह दिखाते हैं।
  • "परिकल्पना बस एक अटकल है।" यह इतना सटीक दावा है कि उसे परखा जा सके और वह ग़लत भी निकल सके। Collatz का दावा ठीक-ठीक कहा गया है, और इसी वजह से वह लगभग नब्बे साल से टिका हुआ है।
पूरा transcript1,543 शब्द

board पर 4 कतारें लिखी हैं। हर कतार एक संख्या से शुरू होती है — 12, फिर 17, फिर 21, और फिर 22। हर कतार किसी नियम से बनी है, और वो नियम कहीं लिखा नहीं है। चारों को एक ही नियम ने बनाया है। क्या तुम सिर्फ़ संख्याएँ देखकर वो नियम पकड़ सकते हो? एक-एक कदम देखो। 12 के बाद 6 आया, और 6 के बाद 3। यहाँ हर बार आधा हो रहा है।

पर 3 के बाद 10 आया, जो बड़ा है। तो नियम सिर्फ़ आधा करना नहीं है। संख्या के हिसाब से नियम बदलता है। नियम में 2 रास्ते हैं। अगर संख्या सम है, तो उसे आधा कर दो। और अगर विषम है, तो उसे 3 से गुणा करके 1 जोड़ दो। 12 सम है, इसलिए आधा — 6। यही सम वाला रास्ता है। 3 विषम है, इसलिए दूसरा रास्ता — 3 गुना 3 यानी 9, और उसमें 1 जोड़कर 10।

इसीलिए 3 के बाद 10 आया। और फिर जो संख्या मिली, उसी पर नियम दोबारा लगाओ। बस इतना ही नियम है। अब पूरी पहली कतार बनाओ। 12 आधा होकर 6, 6 आधा होकर 3, 3 विषम है तो 10, 10 आधा होकर 5। 5 विषम है, तो 3 गुना 5 और 1, यानी 16। और 16 से आगे सिर्फ़ आधा होता जाता है — 8, 4, 2, और 1। पूरी कतार में 10 संख्याएँ हैं, यानी 9 कदम, और वो 1 पर रुक जाती है।

और चारों कतारें एक ही तरह ख़त्म होती हैं — 16, 8, 4, 2, 1। शुरुआत अलग, अंत एक। पहली नज़र में लगता है कि ये नियम संख्या को छोटा करता जाता है। क्या सच में सिर्फ़ नीचे ही जाता है? नहीं, ऐसा नहीं है। तीसरी कतार देखो — वो 21 से शुरू होती है, और पहला ही कदम उसे 64 पर ले जाता है। 3 गुना 21 यानी 63, और 1 जोड़कर 64।

यानी एक ही कदम में संख्या 3 गुना से भी बड़ी हो गई। और ये किसी एक संख्या की बात नहीं है। हर विषम संख्या को ये नियम ऊपर फेंकता है, क्योंकि 3 गुना करके जोड़ने से संख्या हमेशा बढ़ती है। अगर नियम सिर्फ़ घटाता, तो हर कतार का 1 पर पहुँचना साफ़ होता। ऊपर जाने वाले कदम ही पूरी मुश्किल हैं। कोई भी विषम संख्या लो और उसे 3 से गुणा करो।

जवाब फिर भी विषम रहता है। अब उसमें 1 जोड़ो। विषम में 1 जोड़ते ही वो सम हो जाता है। इसलिए विषम संख्या के बाद अगली संख्या हमेशा सम होती है। 2 विषम संख्याएँ कभी साथ-साथ नहीं आ सकतीं। 1 से 1000 तक हर शुरुआत की हर कतार में ये जाँचा गया — 59542 जोड़ियाँ, और एक भी जगह 2 विषम संख्याएँ साथ नहीं मिलीं। पर यहाँ भरोसा गिनती से नहीं आया।

ऊपर वाला कारण हर विषम संख्या के लिए काम करता है, इसलिए जाँच सिर्फ़ उसकी पुष्टि है। 64 पर लौटो। 64 सम है, तो आधा — 32। 32 भी सम, 16 भी, 8, 4, 2, और आख़िर में 1। इस पूरी कतार में एक भी संख्या विषम नहीं है। इसलिए विषम वाला रास्ता कभी आता ही नहीं, और कतार सीधे नीचे उतरती है। 64 को 2 से बार-बार आधा करते हुए 1 तक पहुँचने में ठीक 6 कदम लगते हैं, क्योंकि 64 खुद 2 को 6 बार दोगुना करके बना है।

इसीलिए 21 वाली कतार इतनी छोटी है। एक कदम में वो 64 पर पहुँचती है, और उसके बाद का पूरा रास्ता पहले से तय है। अब चौथी कतार। 22 आधा होकर 11, 11 विषम है तो 34, और 34 आधा होकर 17। और 17 वही संख्या है जहाँ से दूसरी कतार शुरू हुई थी। दोनों कतारें यहाँ मिल जाती हैं। 17 के बाद दोनों कतारें बिलकुल एक जैसी हैं — हर संख्या वही, हर कदम वही।

इसकी वजह साफ़ है। अगली संख्या सिर्फ़ मौजूदा संख्या से बनती है — ये मायने नहीं रखता कि तुम वहाँ कैसे पहुँचे। इसलिए मिलने के बाद अलग होना नामुमकिन है। 1 से 60 तक की हर जोड़ी जाँची गई — 1770 जोड़ियाँ — और कहीं भी 2 कतारें मिलकर दोबारा अलग नहीं हुईं। यानी लंबी कतार छोटी कतार के आगे सिर्फ़ 3 संख्याएँ जोड़ देती है — 22, 11 और 34।

बाकी सब वही है। अब वो दावा जो इस नियम के साथ जुड़ा है। कोई भी पूर्ण संख्या लो, उस पर ये नियम बार-बार लगाओ, और तुम 1 पर पहुँच जाओगे। ये दावा ढीला नहीं है। इसमें साफ़ लिखा है — कौन-सी संख्याएँ, कौन-सा नियम, और अंत कहाँ। इसीलिए इसे जाँचा जा सकता है, और इसीलिए ये गलत भी साबित हो सकता है। इसे सिर्फ़ अंदाज़ा कहना ठीक नहीं होगा।

अंदाज़ा इतना साफ़ नहीं होता कि उसे गलत ठहराया जा सके। ये दावा इतना साफ़ है। और इसे गिराने के लिए सिर्फ़ 1 संख्या काफ़ी है — कोई ऐसी शुरुआत जो कभी 1 पर न पहुँचे। आज तक ऐसी 1 भी नहीं मिली। इस video के लिए 1 से 100000 तक हर शुरुआत चलाकर देखी गई। हर एक कतार 1 पर पहुँची, बिना किसी अपवाद के। इनमें सबसे लंबी कतार में 351 संख्याएँ थीं।

यानी कुछ शुरुआतें बहुत लंबा रास्ता लेती हैं, पर लौटती सब हैं। तो क्या 100000 शुरुआतें जाँच लेना दावे को सच साबित कर देता है? नहीं, इतना काफ़ी नहीं है। पूर्ण संख्याएँ कभी ख़त्म नहीं होतीं। तुमने जहाँ तक जाँचा, उसके ठीक आगे 1 और संख्या खड़ी है, और उसके आगे 1 और। जाँच उतने ही मामलों को तय करती है जितने तुमने जाँचे। 100000 जाँचने से 100001 के बारे में कुछ नहीं कहा जाता।

अब इसकी तुलना 2 की घातों से करो, जहाँ हमने बात पक्की कर दी थी। वहाँ हमने एक-एक करके मामले नहीं जाँचे। हमने कारण दिया — ऐसी हर संख्या की पूरी कतार सम रहती है, इसलिए सिर्फ़ आधा होना होता है, इसलिए वो सीधे 1 तक उतरती है। और वो कारण इस बात की परवाह नहीं करता कि संख्या कितनी बड़ी है। वो पूरे परिवार पर एक साथ लागू होता है — यही किसी बात को पक्का करना कहलाता है।

पर ये परिवार छोटा है। 1 से 100 तक सिर्फ़ 7 संख्याएँ 2 की घात हैं। बाकी 93 के लिए ऐसा कोई कारण हमारे पास नहीं है। तो हालत ये है — एक छोटे से परिवार के लिए हमारे पास कारण है, और बाकी सबके लिए सिर्फ़ जाँचे हुए मामले। यही वो खाई है जो अब तक भरी नहीं गई। शायद तुम्हें लगे कि 'अनसुलझा' का मतलब कुछ और है।

तो क्या इसका मतलब ये है कि किसी ने कोशिश ही नहीं की? बात इसकी उल्टी है। इसका मतलब है कि बहुत लोगों ने कोशिश की और कोई सफल नहीं हुआ। अनसुलझा सवाल कोशिशों का रिकॉर्ड है, अनदेखी का नहीं। और इसका ये मतलब भी नहीं कि दावा शायद गलत है। जितनी भी संख्याएँ जाँची गई हैं, सब 1 पर पहुँची हैं। कमी सबूतों की नहीं, कारण की है। जो चीज़ नहीं है, वो है एक ऐसा कारण जो हर संख्या पर एक साथ लागू हो — वैसा ही जैसा 2 की घातों के लिए था, पर सबके लिए।

और ये सवाल नया नहीं है। ये दशकों से खुला पड़ा है, और आज भी उतना ही खुला है। एक छोटी-सी संख्या लो — 27। ये विषम है, तो पहला कदम उसे ऊपर फेंकेगा। पर कितना ऊपर, ये चौंकाने वाला है। 27 की कतार 9232 तक चढ़ जाती है — अपनी शुरुआत से 300 गुना से भी ज़्यादा ऊँचाई। और 1 तक लौटने में उसे 111 कदम लगते हैं। अब उसके ठीक बगल वाली संख्या देखो — 26।

वो सिर्फ़ 10 कदम लेती है और 40 से ऊपर कभी नहीं जाती। 26 और 27 पड़ोसी हैं, और उनके रास्ते ज़मीन-आसमान का फ़र्क रखते हैं। संख्या को देखकर ये नहीं बताया जा सकता कि उसका सफ़र कैसा होगा — यही इस सवाल को कठिन बनाता है। अब तुम एक चलाओ — 100 से शुरू करो। 100 सम है, आधा होकर 50। 50 भी सम, आधा होकर 25। 25 विषम है, तो 3 गुना 25 और 1 — यानी 76।

कतार फिर ऊपर चली गई। आगे चलकर वो 88 तक भी चढ़ती है, पर अपनी शुरुआत 100 से ऊपर कभी नहीं जाती। यानी कतार चढ़ सकती है और फिर भी शुरुआत से नीचे रह सकती है। पूरी कतार में 26 संख्याएँ हैं, यानी 25 कदम, और अंत वही — 1। और रास्ते में वो 22 से टकराती है — वही 22 जिससे हमारी चौथी कतार शुरू हुई थी। वहाँ से आगे दोनों एक ही रास्ता चलती हैं।

पीछे मुड़कर देखो। नियम में सिर्फ़ 2 रास्ते हैं — सम को आधा, विषम को 3 गुना और 1। और अब तक जितनी भी कतारें चलाई गईं, सब 1 पर ख़त्म हुईं। रास्ते में 2 बातें हमने कारण देकर पक्की कीं — विषम के बाद हमेशा सम आता है, और 2 कतारें मिलने के बाद कभी अलग नहीं होतीं। 2 की घातों वाला परिवार पूरी तरह तय है, क्योंकि वहाँ कारण मौजूद है।

और 27 का 9232 तक चढ़ना दिखाता है कि बाकी संख्याओं के लिए ऐसा कोई आसान कारण क्यों नहीं मिला। और सबसे बड़ी बात यही है — 'काम करते देखा' और 'पता है कि काम करेगा' एक बात नहीं है। जिस दिन कोई हर संख्या पर एक साथ लागू होने वाला कारण दे देगा, ये सवाल सुलझ जाएगा। तब तक ये खुला है, और तुम भी इसे चलाकर देख सकते हो।

यह कहाँ बैठता है

यह उन notes से लिया गया है जिनसे हर video बनी है, पढ़ने के क्रम से नहीं — ये वे ideas हैं जिन पर यह टिका है, और वे जो आगे चलकर इस पर टिकते हैं.

किस पर टिका है

आगे फिर कहाँ आता है

इसके ठीक पहले और ठीक बाद

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