PrepShorts · पढ़ाई की शीट · Class 7 Mathematics · Chapter 6, Constructions and Tilings
Chapter 6 · Constructions and Tilings
तनी हुई रस्सी, compass और straightedge दोनों: शुल्ब-सूत्रों के constructions
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compass पर भरोसा इसलिए नहीं कि वह धातु की है - इसलिए कि घूमते हुए भी उसकी दूरी नहीं बदलती। जो भी चीज़ यही शर्त निभाए, वह उतनी ही भरोसेमंद।
मुख्य idea
कोई construction अपने औज़ार से तय नहीं होता, बल्कि उस शर्त से तय होता है जिसे औज़ार लागू करता है। compass पर भरोसा इसलिए है कि घूमते हुए वह एक दूरी को स्थिर रखता है; खूँटे से बँधी तनी हुई रस्सी ठीक यही करती है, और दो खूँटों के बीच तनी रस्सी सीधा किनारा भी देती है — इसलिए रस्सी एक ही चीज़ में compass भी है और straightedge भी, और वैदिक वेदी बनाने वाले इस chapter की geometry आँगन के पैमाने पर कर रहे थे। एक मामले में रस्सी compass से बेहतर भी है: पहले उसे बीच से मोड़ लो, तो दोनों आधे अपने-आप बराबर रहते हैं, इसलिए बराबर-दूरी की वह शर्त, जिस पर पूरा construction टिका है, हाथ से माँगी जाने के बजाय औज़ार में ही बनी रहती है।
आपको क्या आना चाहिए
- शुल्ब-सूत्रों को भारत के सबसे पुराने बचे हुए ग्रंथों के रूप में पहचानना जिनमें ये construction तरीक़े हैं, और बताना कि वे किस लिए लिखे गए थे
- समझाना कि रस्सी ऐसा क्या कर सकती है जिससे वह compass और सीधे किनारे दोनों की जगह ले लेती है
- रस्सी से perpendicular bisector बनाने के construction को क़दम-दर-क़दम समझना
- समझाना कि बाँधने से पहले रस्सी को दोहरा मोड़ना ही वह क़दम क्यों है जो नतीजे को पक्का करता है
- पहले देखे जा चुके congruence तर्क से रस्सी वाले construction को सही ठहराना
- marked point पर right angle के लिए रस्सी वाला तरीक़ा सुझाना
- angle को bisect करने के लिए रस्सी वाला तरीक़ा सुझाना
- बताना कि construction का तर्क उस औज़ार से स्वतंत्र क्यों है जिससे वह किया जाता है
जानने लायक़ शब्द
| शब्द | एक line में परिभाषा | हिंदी / क्षेत्रीय समकक्ष | पहली बार कहाँ आया |
|---|---|---|---|
| Śulba-Sūtras | वैदिक काल के geometry वाले ग्रंथ जिनमें ये construction तरीक़े हैं | शुल्ब-सूत्र | §6.1, Part II, pp.141–142 में छपा |
| Vedāṅga | वेदों से जुड़े सहायक ज्ञान के छह भागों में से एक | वेदांग | §6.1, Part II, p.141 में italics में छपा |
| Kātyāyana-Śulbasūtra | वह शुल्ब ग्रंथ जिसे chapter रस्सी वाले इस construction का स्रोत बताता है | कात्यायन-शुल्बसूत्र | §6.1, Part II, p.142 में छपा |
| fire altar | वह धार्मिक ढाँचा जिसे बनाने का तरीक़ा ये ग्रंथ बताते हैं | अग्नि-वेदी | §6.1, Part II, p.141 में छपा |
| rope | शुल्ब का वह औज़ार जो arcs भी बनाता है और तानने पर lines भी खींचता है | रस्सी | §6.1, Part II, pp.142, 144 में छपा |
| peg | segment के हर सिरे पर गाड़ा गया छोटा खूँटा | खूँटा | §6.1, Part II, p.142 में छपा |
| loop | रस्सी के हर सिरे पर बना घेरा ताकि उसे खूँटे से बाँधा जा सके | फंदा | §6.1, Part II, p.142 में छपा |
| midpoint | वह point जो रस्सी को, या segment को, बराबर आधों में बाँटता है | मध्य-बिंदु | §6.1, Part II, pp.137, 141, 142 में छपा |
| perpendicular bisector | वह line जो segment को आधा करती है और उससे ठीक सीधी मिलती है | लंब समद्विभाजक | §6.1, Part II, p.137 में छपा, और p.142 पर रस्सी वाले तरीक़े पर लागू |
| compass | वह औज़ार जिसकी जगह यहाँ रस्सी ली गई है | परकार | §6.1, Part II, pp.139–142 में छपा |
| straightedge | सिर्फ़ lines खींचने के लिए इस्तेमाल होने वाला किनारा, जिस पर कोई scale नहीं | बिना निशान वाला रूलर | इस पाठ का शब्द, इस chapter में नहीं छपा — chapter उस औज़ार को अपना नाम unmarked ruler देता है (pp.139–140) |
हिंदी column में standard NCERT हिंदी गणितीय शब्दावली और संस्कृत नामों के standard लिप्यंतरण दिए गए हैं। इस brief के लिए Ganita Prakash Part II का हिंदी संस्करण उपलब्ध नहीं था — Notes देखें।
लोग कहाँ चूकते हैं
- "रस्सी एक सुंदर-सा विकल्प है, पर असली construction के लिए compass चाहिए।" यहाँ सच इसका उलटा है: रस्सी पहले आई, और compass उसका मेज़ वाला रूप है। तर्क को एक तय दूरी चाहिए, और दोनों औज़ार वह देते हैं।
- "रस्सी इतनी ढीली होती है कि सटीक नहीं हो सकती।" वह ठीक तभी सटीक है जब तनी हो — इसीलिए chapter दो बार, एक बार A के लिए और एक बार B के लिए, कहता है कि दोनों हिस्से पूरी तरह खिंचे होने चाहिए। ढील ही ग़लती का अकेला स्रोत है, और वह दिखाई देती है।
- "शुल्ब-सूत्र का मतलब geometry की किताब है।" वे धार्मिक निर्माण की नियमावलियाँ हैं; उनमें geometry इसलिए है कि वेदियाँ तय नाप के हिसाब से बनानी होती थीं। वे किस लिए थे, यह बताओ, उसके बाद यह कि उनमें क्या है।
- "ये compass वाले steps जैसे ही हैं, इसलिए साबित करने को कुछ नहीं।" रस्सी वाला तरीक़ा A और B को एक अलग भौतिक रास्ते से बनाता है, इसलिए chapter उसके लिए अलग औचित्य वाला सवाल रखता है (question 1, p.142)।
- "प्राचीन का मतलब अनुमानित।" इन ग्रंथों की सामग्री के लिए chapter का अपना शब्द exact है; रस्सी वाला construction अनुमान नहीं है और आँगन के पैमाने पर भी अनुमान नहीं बनता।
- "रस्सी की एक लंबाई से एक ही जवाब मिलता है।" रस्सी की लंबाई बदलो तो A और B उसी line पर ऊपर-नीचे खिसकते हैं — यह C और D के बारे में p.139 वाली बात ही है, नए रूप में।
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पूरा transcript1,421 शब्द
compass पर हम भरोसा क्यों करते हैं? इसलिए नहीं कि वह धातु की है, बल्कि इसलिए कि घूमते हुए भी उसकी दोनों नोकों के बीच की दूरी नहीं बदलती। तो असली चीज़ औज़ार नहीं, वह शर्त है जो औज़ार निभाता है, और जो भी चीज़ वही शर्त निभाए, वह भी उतनी ही भरोसेमंद। एक रस्सी लो, एक सिरा खूँटे से बाँधो, और तनी हुई रस्सी को घुमाओ, दूसरा सिरा arc बनाता है।
वही रस्सी 2 खूँटों के बीच कसकर तानो, तो बीच में एक सीधी line मिलती है। यानी एक ही रस्सी compass भी है और सीधी पट्टी भी, पूरा औज़ार बक्सा एक चीज़ में। कुछ लोग रस्सी को compass का कामचलाऊ जुगाड़ समझते हैं, असली तरीका तो compass वाला। बात उल्टी है, रस्सी पहले आई, compass उसी का मेज़ पर चलने वाला छोटा रूप है। तर्क को बस एक तय दूरी चाहिए, और दोनों औज़ार वही देते हैं।
तनी हुई रस्सी सीधी क्यों होती है? क्योंकि कसकर खींचने पर वह सबसे छोटा रास्ता पकड़ती है। और 2 खूँटों के बीच सबसे छोटा रास्ता सीधी line ही है, कोई भी मोड़ उसे लंबा कर देता। इसीलिए तनी रस्सी के किनारे किनारे निशान लगाओ, तो ज़मीन पर सीधी line बन जाती है, पट्टी की ज़रूरत ही नहीं। बहुत पुराने समय में बड़े चबूतरे और आँगन बनाने वाले कारीगर यही करते थे, रस्सी और खूँटे से नाप।
उनके नियम पुराने ग्रंथों में लिखे मिलते हैं, और ये ग्रंथ गणित की किताबें नहीं, बनाने के नियम थे, हर चबूतरा ठीक नाप का होना ज़रूरी था। और पुराना मतलब अंदाज़े वाला नहीं, ये तरीके सटीक थे, आँगन जितने बड़े पैमाने पर भी। ज़मीन पर 2 खूँटे, X और Y, आपस में 24 इकाई दूर। एक रस्सी, जिसके दोनों सिरों पर फंदे, और फंदों को छोड़कर काम वाली लंबाई 26।
काम वही पुराना, XY का perpendicular bisector, पर इस बार बिना compass के। हाथ में न compass, न पैमाना, बस रस्सी और खूँटे। पहले रस्सी को आधा मोड़ो और मोड़ पर निशान लगाओ, दोनों आधे 13 के। ध्यान रहे, मोड़ते समय फंदों वाली रस्सी गिनती में नहीं, बस काम वाली लंबाई आधी करनी है। यह नियम छोटी सी बात लगता है, पर क्या सच में ज़रूरी है? अगर दोनों फंदे बराबर हों, तो पूरी रस्सी मोड़ने पर भी निशान ठीक बीच में, 0 से 12 तक के सभी 13 बराबर जोड़ों में।
पर यह किस्मत है, नियम नहीं। क्योंकि बराबर फंदे दोनों ओर बराबर लंबाई खा जाते हैं, तो बचे हुए आधे भी बराबर रहते हैं। मान लो एक फंदा 2 का और दूसरा 6 का, पूरी रस्सी 34। पूरी रस्सी मोड़ो, तो खूँटों से निशान तक की लंबाइयाँ 15 और 11 निकलती हैं। फ़र्क 4, उतना ही जितना 6 और 2 में, जोड़ अब भी 26, बस बँटवारा गलत। ऐसे निशान को ऊपर खींचो, तो वह बीच की line से 13 बटा 6 हट जाता है।
यह 2 से ज़्यादा, और खूँटे बस 24 दूर, तो गलती छोटी नहीं। गलती का हिसाब, फंदों का फ़र्क 4, गुणा काम वाली रस्सी 26, और उसे खूँटों की दूरी के दोगुने, 48, से भाग। अब नियम मानो, फंदे छोड़कर मोड़ो, शून्य से 7 तक के सभी 64 फंदा जोड़ों में आधे हमेशा 13। और पुराने तरीके की गलती तभी शून्य होती है जब फंदे बराबर हों, जैसे 4 के फंदे के सामने 4 का फंदा।
तो फंदे छोड़ने वाली बात बारीकी नहीं, पूरा तरीका उसी पर टिका है। अब रस्सी के सिरे खूँटों से बाँधो, और मोड़ का निशान पकड़कर ऊपर खींचो। जब दोनों हिस्से पूरे तन जाएँ, वहाँ बिंदु A, बीच से 5 ऊपर। क्योंकि 5 का वर्ग 25 और 12 का वर्ग 144, जोड़ 169, यानी 13 का वर्ग। फिर वही निशान नीचे की ओर खींचो, दोनों हिस्से फिर से पूरे तने, बिंदु B।
चारों दूरियाँ, A X, A Y, B X और B Y, एक ही लंबाई, 13, क्योंकि हर एक उसी रस्सी का आधा। A ऊपर, B नीचे, और दोनों बीच वाली खड़ी line पर। compass का फैलाव 13 हो, तो कटान 5 ऊपर आता है। यहाँ आधी रस्सी 13, और बिंदु A ठीक 5 ऊपर, वही चित्र, वही बिंदु। औज़ार बदला, शर्त वही रही, तो नतीजा भी वही। कुछ कहते हैं कि रस्सी ढीली चीज़ है, सटीक कैसे होगी।
रस्सी तभी सटीक जब तनी हुई हो, इसीलिए दोनों बार, A के लिए भी और B के लिए भी, दोनों हिस्से पूरे ताने जाते हैं। और ढीलापन दिख जाता है, गलती छुपकर नहीं आती। और रस्सी खूँटों की दूरी से लंबी होनी चाहिए, 1 से 60 तक की रस्सियों में से 36 उठती हैं, 25 और ऊपर वाली। ठीक 24 की रस्सी ज़मीन पर सपाट पड़ी रहती है, और 26 वाली 5 ऊपर उठती है।
compass में भी यही शर्त है, फैलाव खूँटों की आधी दूरी से ज़्यादा होना चाहिए, वरना arcs मिलते ही नहीं। अब तर्क वही पुराना, triangle AXB और AYB, तीनों sides बराबर, तो दोनों congruent। उसी से, A और B से होकर जाने वाली line, XY को दोनों तरफ़ 90 degree पर काटती है। और XY के 2 बराबर हिस्से, 12 और 12। यानी रस्सी से XY का बीच भी मिल गया, बिना कुछ नापे।
A पर का angle 90 नहीं, उससे चौड़ा है। यहाँ 90 degree वहाँ है जहाँ नई line XY को काटती है। compass में भी यही बात है, कटान वाला बिंदु बस दिशा देता है। क्या यह compass वाला ही तरीका है, तो साबित करने को कुछ नहीं? नहीं, A तक हम एक अलग रास्ते से पहुँचे, इसलिए देखना पड़ा कि सबूत की हर कड़ी यहाँ भी मिलती है या नहीं।
और सबूत को बस एक बात चाहिए, AX बराबर AY, जो रस्सी अपने आप देती है। अलग लंबाई की रस्सियाँ, 26 वाली, 30 वाली, 40 वाली और 74 वाली। A अलग ऊँचाइयों तक पहुँचता है, 5 तक, 9 तक, 16 तक और 35 तक। पर सभी 4 बिंदु उसी एक खड़ी line पर, रस्सी बदलो तो A ऊपर नीचे खिसकता है, line नहीं। हर बार वही हिसाब, 30 वाली रस्सी का आधा 15, और 144 में 81 जोड़ो तो 225, यानी 15 का वर्ग।
अब पूरे चित्र को 100 गुना बड़ा करो, खूँटे 2400 दूर, आधी रस्सी 1300, और A 500 ऊपर। और 1 गुना, 2 गुना, 5 गुना, 12 गुना और 100 गुना, हर पैमाने पर, आधे फिर भी बराबर, और मिलना फिर भी 90 degree पर। इसीलिए बड़े आँगन जैसे काम में भी यह तरीका सटीक रहता है। एक बात में रस्सी compass से भी बेहतर है। compass में हमें ध्यान रखना पड़ता है कि फैलाव न बदले, रस्सी मोड़ो तो दोनों आधे अपने आप बराबर।
यानी जिस शर्त पर पूरा तरीका टिका है, वह हाथ की सावधानी से नहीं, औज़ार की बनावट से आती है। अब तुम्हारे लिए एक सवाल, रस्सी से किसी बिंदु पर 90 degree का angle कैसे बनाओगे? एक तरीका, बिंदु O से दोनों ओर रस्सी से बराबर कदम, 9 और 9, फिर लंबी रस्सी का आधा, 15, दोनों सिरों से ऊपर खींचो। वह O से 12 ऊपर पहुँचता है, 81 और 144 का जोड़ 225, और O पर 90 degree।
यह काम क्यों करता है? बराबर कदमों से बिंदु O उन दोनों निशानों का ठीक बीच बन जाता है। और ऊपर खींचा बिंदु दोनों निशानों से बराबर दूर, क्योंकि दोनों ओर उसी रस्सी का आधा। यानी यह वही perpendicular bisector है, बस इस बार बीच का बिंदु O पहले से दिया हुआ। और angle को आधा करना हो, तो रस्सी से कैसे करोगे, यह भी सोचकर देखो। एक तरीका, कोने से दोनों arms पर वही रस्सी, दोनों निशान कोने से 25 दूर।
अब दोनों निशानों से बराबर दूर वाले बिंदु, कोने से होकर जाने वाली बीच की line पर, जाँच में 21 बिंदु, हर एक बराबर दूर, और वह line angle को 2 बराबर हिस्सों में बाँटती है। यह क्यों ठीक है? कोने से दोनों निशान बराबर दूर, बीच वाला बिंदु दोनों निशानों से बराबर दूर, और कोने तक की दूरी दोनों में साझी। तो 3 sides बराबर वाले 2 triangles, congruent, और कोने पर के दोनों हिस्से भी बराबर।
फिर वही बात, रस्सी बराबर दूरी पकड़ती है, और सबूत को बस वही चाहिए। ये 2 सवाल खुले हैं, यहाँ हर एक का बस एक तरीका है। कोई भी नया तरीका सोचो, तो बस यह जाँचो कि रस्सी कौन सी बराबर दूरी पकड़ रही है, और क्या सबूत को वही चाहिए। औज़ार नहीं, शर्त मायने रखती है, एक दूरी को पकड़े रखना। तनी हुई रस्सी compass भी है और सीधी पट्टी भी।
मोड़ते समय फंदे छोड़ो, वरना आधे बराबर नहीं। रस्सी तभी सटीक जब पूरी तनी हो। रास्ता अलग, पर सबूत वही, बराबर आधे, congruent triangle, 90 degree।
यह कहाँ बैठता है
यह उन notes से लिया गया है जिनसे हर video बनी है, पढ़ने के क्रम से नहीं — ये वे ideas हैं जिन पर यह टिका है, और वे जो आगे चलकर इस पर टिकते हैं.
किस पर टिका है
- The perpendicular bisector, and the equidistance property that justifies itकक्षा 7 · Ch 6, Constructions and Tilings
- Constructing a 90° angle at a chosen point on a lineकक्षा 7 · Ch 6, Constructions and Tilings
इसके ठीक पहले और ठीक बाद
- Bisecting an angle, and halving 90° to get 45°कक्षा 7 · Ch 6, Constructions and Tilings