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Chapter 4 · Data Handling and Presentation

data की तस्वीर को साफ़ और देखने लायक़ क्या बनाता है

Presentation, and its pitfalls13 मिनट

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सात ऊँचाइयाँ एक सारणी में लिखी हैं, और सातों बिल्कुल सही हैं। फिर भी 2 आसान सवाल उस सारणी से तुरंत नहीं निकलते: पहली ऊँचाई आख़िरी से कितनी ज़्यादा है, और बीच की 2 ऊँचाइयाँ आपस में कितनी अलग हैं। दोनों जवाब घटाकर ही मिलते हैं।

मुख्य idea

numbers सही हो जाने के बाद भी एक चुनाव बचा रहता है, और वह सिर्फ़ पसंद-नापसंद का नहीं है। सात सही ऊँचाइयों वाली table वे दो तुलनाएँ छिपा लेती है जो पढ़ने वाला सचमुच चाहता है; वही सात numbers bars के रूप में बनें तो दोनों एक नज़र में मिल जाती हैं। फिर किताब एक क़दम और आगे जाती है और तर्क देती है कि bars की दिशा नापी जा रही चीज़ की दिशा से मेल खानी चाहिए — ऊँचाइयाँ ऊपर की ओर, दूरियाँ आड़ी — क्योंकि जो तस्वीर दुनिया की ही दिशा में चलती है वह जल्दी पढ़ी जाती है और कम ग़लत पढ़ी जाती है। यहाँ design सटीकता का उलटा नहीं है; यही वह चीज़ है जो सटीकता को पढ़ने वाले के दिमाग़ तक पहुँचाती है।

आपको क्या आना चाहिए

  • chapter के अपने सात पहाड़ों वाले उदाहरण से समझाना कि numbers की table तुलना के लिए कमज़ोर औज़ार क्यों है
  • एक छोटी table को bar graph में बदलना और बताना कि कौन-से सवाल आसान हो गए
  • आड़े bars वाले bar graph को खड़े bars वाले bar graph से अलग पहचानना, और दूसरे को column graph कहना
  • किसी दी गई मात्रा के लिए तय करना कि खड़े bars बेहतर रहेंगे या आड़े, और कारण देना
  • समझाना कि data की तस्वीर को उसकी उपलब्ध जगह में समाने के लिए scale का इस्तेमाल कैसे होता है
  • graph से सातों चोटियों को क्रम देना और सबसे ऊँची और सबसे नीची के बीच का अंतर बताना
  • यह तर्क देना कि साफ़ तस्वीर गणित की ज़रूरत है, सजावट नहीं, क्योंकि तस्वीर बनाने का पूरा मक़सद ही पढ़ने वाले का जवाब है

जानने लायक़ शब्द

शब्दएक पंक्ति में अर्थहिंदी / क्षेत्रीय समकक्षपहली बार कहाँ
column graphऐसा bar graph जिसके bars खड़े होंस्तंभ आलेखइसी chapter में छपा, p.102
bar graphबराबर चौड़ाई वाले bars का display, जिनकी लंबाइयाँ values बताती हैंदंड आलेखReading a bar graph: what length is standing for; p.85
horizontalआड़ा चलता हुआ, ज़मीन के समांतरक्षैतिजइसी chapter में छपा, p.86
verticalखड़ा चलता हुआ, ज़मीन से ऊपर की ओरऊर्ध्वाधरइसी chapter में छपा, p.89
scaleएक unit length की घोषित value, और तस्वीर को उसकी जगह में समाने का औज़ार भीमापकPictographs, and why the scale has to be stated; p.83
columnखड़ा bar, किसी इमारत के खंभे के नाम परस्तंभइसी chapter में छपा, p.102
visually appealingऐसे प्रस्तुतीकरण के लिए किताब का अपना पैमाना जिसे देखने वाले सचमुच पढ़ेंदृष्टि से आकर्षकइसी chapter में छपा, p.101
reading directionकोई मात्रा स्वाभाविक रूप से ऊपर चलती है या आड़ी — उस अंतर के लिए व्याख्या का अपना वाक्यांश जिस पर किताब तर्क तो देती है पर नाम नहीं देतीपठन दिशाव्याख्या का अपना शब्द; इस chapter में नहीं छपा

हिंदी column में आम चलन वाले standard NCERT हिंदी शब्द दिए गए हैं। ये इस chapter के किसी हिंदी संस्करण से नहीं लिए गए — Notes देखें।

लोग कहाँ चूकते हैं

  • "table graph से ज़्यादा सटीक है, इसलिए बेहतर है।" यहाँ दोनों में वही numbers हैं। पढ़ने वाले का जो काम है, यानी तुलना करना, उसमें table कमज़ोर है। सटीकता और काम का होना अलग-अलग गुण हैं।
  • "graph घुमाने से data बदल जाता है।" एक भी ऊँचाई नहीं बदलती। सातों values, उनका क्रम और 1000 m का scale step, p.102 की दोनों तस्वीरों में बिना बदले चले आते हैं; फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि marked axis कितनी दूर तक ले जाया गया है, आड़े में 9000 तक और खड़े में 10000 तक। मदद सिर्फ़ पढ़ने वाले की आँख की हो रही है।
  • "'Column graph' एक अलग तरह का graph है।" यह उस bar graph का नाम है जिसके bars खड़े हों। किताब यह शब्द लाती है और तुरंत इमारत के खंभों की मिसाल से समझा देती है।
  • "आड़े bars ग़लत हैं।" chapter p.87 पर traffic के लिए, p.100 पर बाघों के लिए और p.102 पर पहाड़ों के लिए आड़े bars इस्तेमाल करता है। नियम मेल बैठने के बारे में है, सही-ग़लत के बारे में नहीं।
  • "अच्छा दिखाने का मतलब चीज़ें जोड़ना है।" §4.5 जो कुछ भी करता है वह सिर्फ़ फिर से जमाना है: वही numbers, वही चौड़ाइयाँ, वही scale steps। कुछ नहीं जोड़ा जाता। चीज़ें जोड़ी जाएँ तो क्या होता है, वह अगला topic है।
  • "scale सिर्फ़ हिसाब की बात है।" किताब उसे दूसरा काम भी देती है: तस्वीर को paper में समाना। एक ही फ़ैसला, दो कारण।
  • "Everest, Australia की चोटी का लगभग चार गुना है, क्योंकि 8848 लगभग 2228 का चार गुना है।" यह अनुपात सही है, पर किताब अंतर पूछती है, अनुपात नहीं, और जो व्याख्या ग़लत सवाल का जवाब देती है वह ग़लत आदत सिखाती है। जो पूछा गया है वही निकालो।
पूरा transcript1,928 शब्द

एक सारणी में 7 ऊँचाइयाँ लिखी हैं, मीटर में। यहाँ देखो — 8848, 6962, 6194, 5895, 5642, 4892 और 2228। इसमें कोई संख्या ग़लत नहीं है। ऊपर से नीचे तक सातों सही हैं, और सातों पूरी तरह साफ़ लिखी हैं। पहली नज़र में लगता है कि इससे बेहतर और क्या चाहिए। फिर भी सही होना और काम का होना, 2 अलग बातें हैं। ये सारणी सही है, पर एक काम में बुरी है।

तो किस काम में बुरी है? जवाब सारणी को देखने से नहीं मिलेगा, उससे कुछ पूछने से मिलेगा। तो पूछें क्या? पहला सवाल — पहली ऊँचाई आख़िरी से कितनी ज़्यादा है? सारणी देखकर ये तुरंत नहीं दिखता। घटाओ तो जवाब निकलता है 6620 मीटर। ध्यान दो — ये जवाब घटाने से मिला, देखने से नहीं। सारणी ने सिर्फ़ 2 संख्याएँ दीं, फ़र्क़ ख़ुद निकालना पड़ा। दूसरा सवाल — ऊपर से तीसरी और चौथी ऊँचाई देखो।

इनमें कोई बड़ा फ़र्क़ है, या वो लगभग बराबर हैं? यहाँ फ़र्क़ सिर्फ़ 299 मीटर है। यानी पहला जवाब दूसरे से 22 गुना से भी बड़ा है। दोनों जवाब घटाकर निकालने पड़े। सारणी ने एक भी मुफ़्त में नहीं दिया, जबकि दोनों सवाल इन्हीं 7 संख्याओं के बारे में थे। अक्सर कहा जाता है कि आलेख बनाने से क्रम मुफ़्त में मिल जाता है — कौन सबसे बड़ा, कौन सबसे छोटा।

पर क्या यहाँ क्रम सच में ग़ायब है? पर यहाँ ऐसा नहीं है। ये सारणी पहले से ही घटते क्रम में लिखी हुई है — सबसे बड़ी ऊपर, सबसे छोटी नीचे। जाँच लो — हर अगली ऊँचाई पिछली से कम है, पूरे 6 क़दम। तो क्रम तो पहले से सामने है। इसलिए जो चीज़ ग़ायब थी, वो क्रम नहीं था। क्रम तो मुफ़्त में सामने था। ग़ायब कुछ और था, और वही असली बात है।

तो फिर सारणी छुपा क्या रही है? जो छुपा है वो है हर 2 ऊँचाइयों के बीच का फ़र्क़ — कितना बड़ा है, कितना छोटा। क्रम बताता है कि कौन ऊपर है; फ़र्क़ बताता है कि कितना ऊपर है। ऐसे 6 फ़र्क़ हैं, और हर एक अलग से घटाना पड़ता है — 1886, 768, 299, 253, 750 और 2664। शायद तुम सोच रहे हो कि ये 6 फ़र्क़ आपस में मिलते-जुलते होंगे।

पर ये बिल्कुल बराबर नहीं हैं, और यही सबसे काम की बात है। सबसे बड़ा फ़र्क़ आख़िरी वाला है — 2664, जो पूरी सूची में सबसे नीचे बैठा है। और सबसे छोटा चौथा है — सिर्फ़ 253। यानी सबसे बड़ा फ़र्क़ सबसे छोटे से 10 गुना से भी ज़्यादा है। और इसलिए ये एक भी बात सारणी के चेहरे पर नहीं लिखी। 6 बार घटाकर ही पता चलती है। तो इन 7 को सारणी में छोड़ने के बजाय बनाकर देखते हैं।

पर पहला डिब्बा खींचने से पहले एक चीज़ तय करनी पड़ेगी। वो एक चीज़ कौन सी है? वो चीज़ है मापक। पर यहाँ कोई भी काम का मापक सातों में पूरा नहीं बँटता। सबमें बँटने वाली सबसे बड़ी संख्या 1 है, और 1 के मापक पर सबसे लंबा दंड 8848 इकाई का बनेगा। इसलिए यहाँ मापक दूसरी वजह से चुना जाता है — ताकि तस्वीर उस जगह में समा जाए जो उसे मिली है।

मापक का यही दूसरा काम है। मान लो 18 इकाई की जगह है। तब मापक कम से कम 492 चाहिए, तो 500 चलेगा और 400 नहीं। फ़ैसला वही पुराना है — एक इकाई लंबाई किसके बराबर मानी जाए। बस इस बार वजह अलग है: पहले निशान पर रुकने के लिए, अब जगह में समाने के लिए। नीचे वाली लकीर पर शून्य से 9000 तक निशान लगाओ, 1000-1000 करके। 9000 तक ही क्यों?

क्योंकि सबसे बड़ी ऊँचाई उसी में आ जाती है। फिर हर ऊँचाई के लिए एक डिब्बा बनाओ, जो बाईं ओर से शुरू होकर दाईं ओर चलता है। सातों डिब्बे बराबर मोटाई के, और बीच में बराबर जगह। लग सकता है कि लंबाई अंदाज़े से तय होती होगी। नहीं — हर डिब्बा ठीक उतना ही लंबा है जितना उसकी अपनी संख्या कहती है — लंबाई बराबर संख्या भाग मापक। यही भाग पिछली बार भी लगा था।

इसमें कुछ भी नया नहीं जोड़ा गया। यहाँ देखो — वही 7 संख्याएँ हैं, वही मापक है, बस रखने का तरीक़ा बदल गया है। एक सवाल और — निशान कहाँ तक लगाएँ? सबसे बड़ी ऊँचाई 8848 है, तो कम से कम इतना तो चाहिए ही। 8848 के ऊपर 1000 का पहला निशान 9000 पर पड़ता है। इसलिए लेटी हुई तस्वीर में निशान 9000 तक जाते हैं, और सातों उसमें आ जाते हैं।

खड़ी वाली तस्वीर में निशान एक क़दम और आगे जाते हैं — 10000 तक। एक ख़ाली क़दम ऊपर छोड़ना साफ़ दिखता है। गिनो तो एक पर 10 निशान बनते हैं और दूसरी पर 11। पर दोनों में क़दम वही है — 1000-1000 का। निशान कहाँ तक ले जाने हैं, ये तस्वीर का फ़ैसला है, आँकड़ों का नहीं। आँकड़े दोनों में बिल्कुल वही हैं। अब एक डिब्बा लेकर उसे पढ़कर देखो — चौथा वाला।

उसके सिरे से सीधे निशानों तक जाओ। वो किस निशान पर जाकर रुकता है? किसी पर नहीं। ऊपर वाले और नीचे वाले निशान के बीच में कहीं जाकर ख़त्म होता है — 5000 और 6000 के बीच। तुम्हें लगता होगा कि तस्वीर भी वही सटीक संख्या दे देगी। पर तस्वीर से पढ़ा गया जवाब लगभग 5900 होगा, और सारणी में लिखा है 5895। सारणी ठीक-ठीक बताती है, तस्वीर जल्दी बताती है।

कोई एक दूसरे से अच्छा नहीं — दोनों के काम अलग हैं। इसीलिए अच्छी रिपोर्ट में अक्सर दोनों होते हैं — सारणी भी, और आलेख भी। अब डिब्बों के सिरों को देखो। इनमें अब क्या दिख रहा है जो सारणी में नहीं दिखता था? जो 6 फ़र्क़ पहले एक-एक करके घटाने पड़ते थे, वो अब ख़ुद लंबाई बनकर सामने खड़े हैं। आख़िरी फ़र्क़ सबसे चौड़ा दिखता है, और ये देखने के लिए कुछ घटाना नहीं पड़ा।

आँख ने सीधे बता दिया। और चौथा फ़र्क़ इतना छोटा है कि वो 2 डिब्बे यहाँ लगभग एक ही जगह जाकर ख़त्म होते दिखते हैं। यही उनका लगभग बराबर होना है। इस मापक पर ये 2 फ़र्क़ आपस में 4 इकाई लंबाई से भी ज़्यादा अलग हैं। इतना अंतर आँख पकड़ लेती है। यही इस तस्वीर का असली फ़ायदा है। क्रम नहीं — क्रम तो सारणी में पहले से था।

फ़ायदा है फ़र्क़ों का आकार, जो अब देखा जा सकता है। पहला सवाल अब पूरे फैलाव का बन जाता है। यहाँ देखो — पहले डिब्बे के सिरे से आख़िरी डिब्बे के सिरे तक कितनी दूरी है? वो 6620 है। और मज़े की बात — छहों फ़र्क़ जोड़ो तो वही 6620 मिलता है, जो जाँच है कि कोई क़दम छूटा नहीं। दूसरा सवाल बीच वाला पतला सा टुकड़ा है — यहाँ, 299।

पूरे फैलाव का बीसवें हिस्से से भी कम। यहाँ सोच सकते हो कि तस्वीर में कुछ नया आ गया है। पर संख्याएँ बिल्कुल वही हैं जो सारणी में थीं। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि अब दोनों जवाब बिना घटाए, सिर्फ़ देखकर मिल गए। यहाँ एक बात अक्सर कही जाती है — पहली ऊँचाई आख़िरी से लगभग 4 गुना है। पहली नज़र में ये ठीक भी लगता है। पर है क्या?

जाँचो — यहाँ 2228 को 4 से गुणा करो तो 8912 आता है, जो 8848 से 64 ज़्यादा है। यानी गुना 4 से ज़रा कम है — ऊपर वाला सिरा 4 गुने तक पहुँचता ही नहीं। पर असली गड़बड़ ये नहीं है कि जवाब थोड़ा सा ग़लत है। सवाल ये था कि कितनी ज़्यादा है, ये नहीं कि कितने गुना है। कितना ज़्यादा का जवाब घटाने से आता है, गुणा से नहीं।

पूछा कुछ और जाए और जवाब किसी और सवाल का दिया जाए — ये आदत शुरू में ही तोड़ लेनी चाहिए। अब पूरी बनी हुई तस्वीर को उठाकर एक चौथाई घुमा लो — निशान, नाम, डिब्बे, सब कुछ साथ में घूमे। कुछ भी दोबारा नहीं बनाना। पर घुमाने का मतलब असल में है क्या? घुमाना असल में सिर्फ़ 2 दिशाओं की अदला-बदली है। जो पहले बाईं-दाईं जा रही थी, वो अब ऊपर-नीचे जाती है, और उल्टा भी।

देखो — इसमें एक भी ऊँचाई नहीं बदली। हर डिब्बे की लंबाई ठीक वही रही जो घुमाने से पहले थी — घुमाने से लंबाई बदलती ही नहीं। सातों लंबाइयाँ वही हैं, क्रम वही है, मापक वही है, और निशान भी 1000-1000 पर ही हैं। और अगर 2 बार घुमा लो, तो हर डिब्बा वहीं लौट आता है जहाँ से चला था। कोई तो चीज़ होगी जो इस घुमाव से बदली है।

तो अगर कुछ बदला ही नहीं, तो घुमाया ही क्यों? एक चीज़ ज़रूर बदली — कौन सी दिशा संख्या उठा रही है। यही पूरे घुमाव की कमाई है। घुमाने से पहले संख्या आड़ी दिशा में चल रही थी — यहाँ, बाएँ से दाएँ — और खड़ी दिशा में हर डिब्बा शून्य था। घुमाने के बाद ठीक उल्टा है — संख्या ऊपर की ओर चलती है, और आड़ी दिशा में कुछ नहीं।

दोनों तस्वीरों में बस इतना ही फ़र्क़ है — न कोई संख्या, न क्रम, न मापक। और यही छोटा सा फ़र्क़ सबसे काम का निकलता है। जब दंड खड़े हों, तो उस आलेख का अपना एक नाम है। वो नाम क्या है? उसे स्तंभ आलेख कहते हैं। स्तंभ यानी वो खंभा जो छत को ऊपर उठाकर रखता है। खड़े दंड देखने में बिल्कुल वैसे ही लगते हैं, और नाम वहीं से आया है।

पहली नज़र में ये कोई अलग किस्म का आलेख लगता है। पर नहीं — ये वही दंड आलेख है, बस दंड खड़े कर दिए गए हैं। नाम नया है, चीज़ नहीं। दोनों तरह पूरी तरह सही हैं। यहाँ सवाल ये नहीं कि कौन सा जायज़ है — सवाल ये है कि किस चीज़ के लिए कौन सा ज़्यादा जँचता है। अब वो नियम, जिस तक ये पूरा विषय पहुँच रहा था।

किसी चीज़ का आलेख किस दिशा में बनाना चाहिए? जिस दिशा में वो चीज़ ख़ुद नापी जाती है। ऊँचाई ज़मीन से ऊपर की ओर नापी जाती है। इसलिए ऊँचाइयों के लिए खड़े दंड ज़्यादा जँचते हैं — यानी स्तंभ आलेख। और दूरी ज़मीन के साथ-साथ लेटी हुई होती है, ऊपर की ओर नहीं जाती। इसलिए दूरियों के लिए लेटे हुए दंड जँचते हैं। तब तस्वीर उसी दिशा में चलती है जिसमें असली चीज़ चलती है, और पढ़ने वाले को कुछ उल्टा करके सोचना नहीं पड़ता।

ये नियम जायज़-नाजायज़ का नहीं है। लेटे हुए दंड ग़लत नहीं होते — बस ऊँचाइयों पर खड़े दंड ज़्यादा जँचते हैं। अब ये ख़ुद तय करके देखो। पहला काम — 7 कक्षाओं में से हर एक का सबसे लंबा बच्चा लो, और उसकी ऊँचाई का आलेख बनाओ। इसके लिए खड़े दंड चुनोगे, या लेटे हुए? शायद तुम कहोगे कि दोनों में से कुछ भी चल जाएगा। पर ये ऊँचाई है, इसलिए खड़े दंड।

बच्चे की ऊँचाई भी ज़मीन से ऊपर की ओर ही नापी जाती है। दूसरा काम — 7 नदियों में से हर एक की लंबाई का आलेख बनाना है। नदी ज़मीन पर लेटी हुई चलती है, इसलिए लेटे हुए दंड। यही वो जोड़ है जो नियम माँगता है। यहाँ ये सवाल पूछना जायज़ है कि इस सबका गणित से लेना-देना क्या है। क्या ये सिर्फ़ सजावट की बात नहीं है? पर ध्यान दो — इस पूरे वीडियो में कहीं कुछ जोड़ा नहीं गया।

ऊपर वाली सारणी और नीचे वाली तस्वीर, दोनों में वही 7 संख्याएँ, वही चौड़ाइयाँ, वही मापक। सिर्फ़ रखने का तरीक़ा बदला, और वही सवाल जो पहले घटाकर निकलते थे, अब देखकर निकलने लगे। यही तो हिसाब का काम है। आलेख इसीलिए बनता है कि कोई उसे पढ़े। जो तस्वीर कोई पढ़ ही न सके, उसने किसी सवाल का जवाब नहीं दिया। तो तस्वीर के 2 काम हैं — सही होना, और देखने लायक़ होना।

दूसरा काम पहले से कम ज़रूरी नहीं है।

यह कहाँ बैठता है

यह उन notes से लिया गया है जिनसे हर video बनी है, पढ़ने के क्रम से नहीं — ये वे ideas हैं जिन पर यह टिका है, और वे जो आगे चलकर इस पर टिकते हैं.

किस पर टिका है

आगे फिर कहाँ आता है

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